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उत्तराखंड धरातल स्थिति चोप्प ! चुप ! चुप !

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

        उत्तराखंड धरातल स्थिति

             चोप्प ! चुप ! चुप !

       देखना,सुनना, बोलना,बताना मना है …….!

पुष्कर पवार’पदम’


    उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से लगातार उत्तराखंड की स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है। राज्य में जो भी सरकारें आई उनके द्वारा उत्तराखंड के जल, जंगल और जमीन को सदुपयोग करने के बजाए ठिकाने लगाने का काम ही किया गया। जब से उत्तराखंड राज्य बना है यहां की सरकारें नारायण दत्त तिवारी काल को छोड़कर अस्थिरता के दौर में रही। राज्य को किसी उपलब्धि मिली हो या नहीं, लेकिन मुख्यमंत्री बनाने की फैक्ट्री के रूप में अवश्य पहचान मिली है।  वर्तमान भाजपा सरकार सत्ता में में आने के बाद इसे पत्थर के शिलालेख की तरह साबित कर भी दिखाया है। वहीं वर्तमान भाजपा सरकार के कई अनोखे, चौकानेवाले निर्णय कानून को ठेंगा दिखाने वाले निर्णय साबित हुए हैं। उत्तराखंड की आम जनता को इन निर्णयों पर हैरानी पर हैरानी हो रही है। उत्तराखंड में जिस प्रकार से नियम कानूनों को तोड़ मरोड़ कर भाजपा ने अपने नजदीकियों को लाभ पहुंचाने के लिए अनोखे अनोखे नियम बनाए हैं उनसे राज्य का हित होने के बजाय राज्य को खासा नुकसान पहुंच रहा है। कहने को तो राज्य की अचल संपत्ति खासी मजबूत दिखाई देती है। यहां के जल, जंगल,मीन,पर्यटन, तीर्थाटन, ऊर्जा उत्पादन, उद्यानिकी पूरे विश्व में जो पहचान बनाए हुए हैं वह किसी से छिपा नहीं। लेकिन उत्तराखंड की अचल संपत्ति का उपयोग का दुरुपयोग जिस प्रकार से देखने को मिल रहा है वह उत्तराखंड राज्य के लोग ही नहीं पूरा देश के लोग देख,सुन और पढ़ ही रहे हैं। राज्य बनने के बाद से जिस प्रकार उत्तराखंड में लोगों की आवाज दबाने का काम सबसे ज्यादा हुआ है उससे यहां पर प्रतिभाएं पलायन को विवश हुई हैं जिसका राज्य का टैलेंट राज्य से बाहर जाकर बाहरी राज्यों को ऊंचाइयों पर ले जाने का भी काम कर रहा है। 

वर्तमान भाजपा सरकार के इस कार्यकाल में तो अनोखे अनोखे निर्णय ने सबको चौंका कर रख दिया है राज्य की खनन नीति हो, शराब नीति हो, शिक्षा नीति हो, औद्योगिक नीति, स्वास्थ्य, सड़कें और  बेरोजगारों को रोजगार दिलाने की नीति। जिस के लिए लगातार सबसे ज्यादा उत्तराखंड के राज्य के लोग रोना रो रहे हैं वह यहां से पलायन की मार, अपने जल जंगल जमीन में हक हकूक की मांग और भू कानून की मांग को लेकर लगातार संघर्ष होने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा अनदेखा करना राज्य के लोगों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा हुआ है। कई बार लोगों को कहते सुना जा सकता है कि इससे तो यूपी का राज अच्छा था या हम यूपी के राज्य में खुशहाल थे। लखनऊ से उत्तराखंड राज्य के लिए बहुत सारे ऐसे निर्णय हुए हैं जो राज्य के लिए मील का पत्थर साबित हुए हैं। वर्तमान खनन नीति को लेकर ही देख लो पूरे देश सहित पड़ोसी राज्य में खनन बंद है। जो खनन अंग्रेजों के समय से लेकर इस भाजपा सरकार के पहले तक कभी बरसात में नहीं हुआ इस सरकार ने उसे चैनेलाइजेशन, रीवर ट्रेनिंग के नाम पर बरसात में शुरू कर सीधे सीधे कानून से खिलवाड़ किया है। उत्तराखंड की की इस खनन नीति पर पर्यावरण मंत्रालय की चुप्पी भी समझ से परे है। इस पर जिसने भी आवाज उठाई उसे साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनाकर चुप करा दिया गया। खनन का विरोध करने वाले आम जनमानस से लेकर मीडिया तक पर मुकदमे बाजी, प्राण घातक हमले कर जान से मारने का प्रयास करने तक के प्रयास कर जबरन खनन कार्य करवाने का काम किया गया। 

शराब नीति जो भाजपा सरकार कांग्रेसी कार्यकाल में पहाड़ में शराब का विरोध करती नजर आती थी। हरीश रावत सरकार को तो भाजपा ने जमकर शराब नीति को लेकर जो ड्रामेबाजी की थी वह किसी से छिपी नहीं, परंतु यही भाजपा सरकार वर्तमान में सत्ता में आते ही शहर से लेकर गली मोहल्लों मोबाइल बैन व यहां तक कि परचून की दुकानों तक में शराब बिकवाकर अपने को रामराज, धर्मराज की सरकार बता कर पहाड़ की जवानी को पानी में मिलाने में तुली है। वर्तमान में जिसने भी शराब नीति का विरोध किया है उसकी आवाज दबाने के लिए उन पर मुकदमे करने से नहीं चूकती,यहां तक कि मातृ शक्ति को भी नहीं बख्शा उसकी भी आवाज चुप करा दी गई। जंगल जोकि उत्तराखंड वासियों की अपनी एक बहुत ही बहुमूल्य उपलब्धि है जिसे बचाने के लिए उत्तराखंड वासियों ने चिपको आंदोलन जैसा आंदोलन चलाया जो पूरे विश्व में जंगलों को बचाने के लिए एक मिसाल कायम पेश करता है उस जंगल नीति को वर्तमान भाजपा सरकार ने लाखों-करोड़ों पेड़ कटवा आलवेदर रोड, बड़े बांधों, धन्ना सेठों के ऐशगाह रिजोर्ट और होटलों के नाम पर बर्बाद करके रख दिया लेकिन अपने राज्य के भीतर बनने वाली सड़कों हरिद्वार-रामनगर, लालढांग चिल्लरखाल जैसी दो सौ से ज्यादा सड़कों के लिए कई अंडे लगाकर साबित कर दिया कि वर्तमान भाजपा सरकार राज्यवासियों की कितनी हितैशी और संवेदनशील है ? आवाज उठाने वालों के लिए कानून का डंडा दिखाकर आवाज को दबाकर फिर से उन्हें चुप कर दिया गया। 

उत्तराखंड का पानी तो अब पानी की जगह शराब बन कर रह गया है, लेकिन फिर भी उत्तराखंड की जल नीति आज भी लोगों को ‘कुएं के पास प्यासा’ रहने जैसी स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया। उत्तराखंड में बने भारी-भरकम बांध यह बताते हैं कि उत्तराखंड वासियों को कैसे उनके मूल घरों और गांवों से जबरन हटाया गया और उस पानी का उपयोग तो पांच सितारा होटलों बड़े-बड़े शहरों के लिए हो रहा है लेकिन उत्तराखंड के लिए यह उपलब्धि संभव नहीं। वही इस पानी से बनने वाली बिजली का तो और भी बुरा हाल है। ऊर्जा प्रदेश के नाम से जाने जाना वाला राज्य आज दूसरे राज्यों से ऊर्जा की भीख मांगने के लिए विवश है। जब से वर्तमान ऊर्जा मंत्री ने कार्यभार संभाला तब से तो ऊर्जा प्रदेश की हालत बद से बदतर हो चली है। पड़ोसी राज्य 24 घंटे में 20 घंटे बिजली पहुंचा रहा है अपने जनता के लिए, लेकिन जो ऊर्जा प्रदेश है उसे प्रदेश की जनता को 10 घंटे लगातार बिजली भी मुनासिब नहीं हो रही है। यहां पर भी आवाज उठाने वालों को चुप करा दिया जा रहा है। उद्योग नीति में ही देख लो हमारे माननीयों ने कितने बड़े उद्योग राज्य में स्थापित करवाए ?  बड़े उद्योग आने के बजाय 5 साल बाद सब्सिडी खा कर चलते बन रहे हैं। रोजगार की कोई स्पष्ट नीति न होने के कारण राज्य का युवा अब भी पलायन को विवश है। जिस राज्य में पहाड़ में पलायन रोकने का कार्यालय पहाड़ की जगह राजधानी देहरादून से संचालित हो तो कैसे पलायन रुक पाएगा। राज्यों की चार धाम यात्रा को जोड़ने वाली अधिकांश सड़कें यात्रियों के लिए स्वर्गलोक का रास्ता खोले नजर आती है।  सड़कों पर बनते निर्माणाधीन पुल जिस तरह धराशाई हो रहे हैं वह भी सभी लेख,सुन रहे हैं लेकिन चुप्पी हैं, क्योंकि उन्हें बोलने और बताने का अधिकार नहीं है। 

सबसे बड़ी एक और समस्या कानून व्यवस्था – पूरे राज्य की कानून व्यवस्था राज्य में बिगड़े हालातों, बढ़ती अपराधी प्रवृत्तियों, बढ़ते नशे के कारोबार, पड़ोसी राज्यों से अपराधियों का राज्य में बढ़ता प्रभाव, आए दिन हो रही लूट खसोट, महिला के साथ हो घिनौने अपराध, ह्यूमन ट्रैफिकिंग,बाल अपराध जैसे अपराधों ने राज्य की जनता की नींद हराम कर रख दी है। अब राज्य की जनता को सोचना होगा कि उन्हें कैसे जनप्रतिनिधियों को विधानसभा में पहुंचाना होगा जो उनके राज्य का हित के लिए समर्पित हो ना की व्यक्तिगत।


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