उत्तराखंड में जारी है पलायन का दौर, लोग छोड़ रहे अपना गांव, लगातार बढ़ रही घोस्ट विलेज की संख्या
रिपोर्ट – पुष्कर सिंह पवार
उत्तराखंड बनने के बाद उत्तराखंडियों ने सोचा था कि राज्य बनने के बाद पहाड़ के लोगों की पहाड़ सी जीवनशैली में बदलाव आएगा, परन्तु 22 साल के युवा उत्तराखण्ड की तस्वीर पलायन की वजह से कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। विभिन्न जांच एजेन्सियों, सर्वे संस्थाओ व स्वयं सरकार की एजेंसियां की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंडी अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। गजब तो यहहै कि जिन संभावनाओं और जरुरतों के लिए राज्य बनाया गया उन जरुरतों और संभावनाओं पर तुसारापात होने के कारण पलायन आयोग का गठन जैसा निर्णय सरकार को लेना पडा़ है।
क्या कहती है पलायन आयोग की रिपोर्ट …..?
देहरादून: उत्तराखंड के ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने 2018-2022 की अपनी अंतरिम रिपोर्ट राज्य सरकार को सौंप दी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2018 से 2022 तक, कुल 3.3 लाख लोग राज्य के विभिन्न हिस्सों, खासकर पहाड़ियों से पलायन कर गए। इनमें से से 92 प्रखंडों के 6,436 गांवों के 3 लाख लोगों ने अस्थायी प्रवासन का विकल्प चुना।
उत्तराखंड के ग्रामीण विकास एवं पलायन निवारण आयोग ने प्रदेश में पलायन की स्थिती को लेकर अपनी ताजा रिपोर्ट जारी कर दी है। रिपोर्ट के मुताबिक सबसे कम स्थायी प्रवास देहरादून (312) और उधम सिंह नगर (82) जिलों में मिला। जबकि अल्मोड़ा में 54,519 लोगों ने अस्थायी प्रवास का विकल्प चुना। इसके बाद टिहरी में 41,359 और पौड़ी में 29,093 लोगों ने अस्थायी प्रवास किया। चंपावत (13,711) और देहरादून (9,309) में सबसे कम अस्थायी पलायन दर्ज किया गया।
इस अवधि में 72 प्रखंडों के 2,067 गांवों के 28,631 लोग स्थायी रुप से बाहर चले गए। रिपोर्ट के मुताबिक 2011 तक, उत्तराखंड में 1,034 निर्जन गांव थे और 2011 से 2018 तक इनकी संख्या में 734 की वृद्धि हुई।
