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पहाड़ का पानी पहाड़ वासियों के लिए नहीं

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

 पहाड़ का पानी पहाड़ वासियों के लिए नहीं

पानी को लेकर पहाड़ों में त्राहि-त्राहि

पहाड़ का हिस्से का पानी होटल और रिसॉर्ट ओं को पहुंचाया जा रहा है

जनप्रतिनिधि और विभागीय अधिकारी फोन उठाने को नहीं तैयार

पौड़ी गढ़वाल की वीआईपी विधानसभाओं का सबसे ज्यादा बुरा हाल

  पीने के पानी की राह तकते पानी के नल और खाली बर्तन

पौड़ी गढ़वाल पानी बिन सब सून पानी नहीं तो जीवन नहीं यह उक्ति पहाड़ों पर खूब फलती है। कोई जमाना था जब पहाड़ों में लोग केवल पानी पीने के उद्देश्य से कोई दिन घूमने फिरने आया जाया करते थे, लेकिन जब से उत्तराखंड राज्य बना है पानी को लेकर पहाड के निवासीयों की बहुत बुरी दशा हो चुकी है। कहने को तो पहाड़ों में जल जीवन मिशन के तहत घर-घर नल पहुंचा दिए गए हैं लेकिन अगर धरातल पर देखा जाए तो जल जीवन मिशन से लगाए गए नलों में पानी टपकते देखने के लिए लोगों की आंखें तरस गई हैं। पौड़ी गढ़वाल के लैंसडौन विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम बबीना तोली और उसके आसपास के गांव में इन दिनों पानी की त्राहि-त्राहि मची हुई है। नलों के पास खाली बर्तनों के लगे ढेर पहाड के पानी की हालत बयां कर रहे हैं। जब मौके पर लोक संवाद टुडे की टीम पहुंची तो सरकार की करनी और कथनी में काफी अंतर देखने को मिला। चुनाव के समय गला फाड़ फाड़ कर चिल्लाने वाले जनप्रतिनिधि पहाड़ की भोली-भाली जनता को देहरादून और शहरों से अपने वादों से सपने दिखाने वाली भाजपा सरकार के विधायक से लेकर पंचायत स्तर तक के जनप्रतिनिधियों की पोल सब खुलत नजर आई, जब लोग संवद टुडे की टीम ग्राउंड जीरो पर पहुंचकर रिपोर्टिंग करने पहुंची तो देखा नल और पानी के स्रोत जल संस्थान और अपने जनप्रतिनिधियों के मुंह ताक रहे थे ! ग्रामीणों के अनुसार कई बार विभागीय अधिकारियों को जब फोन किया जाता है तो वह फोन नहीं उठाते ग्रामीण पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधियों को फोन किया जाता है तो वह शहरों में बैठे मिलते हैं।

  विना सिंचाई पानी के सूखती पहाड़ी मिर्च की फसल

      पहाड़ के लिए सबसे शर्मनाक बात यह है कि पहाड़ के स्थानीय जनप्रतिनिधि शहरों में बैठकर पहाड़ी गांव की जनप्रतिनिधित्व की भूमिका निभा रहे हैं। शहरों में रहकर अपनी पहुंच विधायक, मंत्री तक वनाने की जुगत में ज्यादा लगे हैं,कुछ कुछ जनप्रतिनिधि तो चापलूसी कर प्रधानी, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत के कामकाज के बजाय ठेकेदारी कमीशन एजेंट बनकर, गांवों के विकास में मट्ठा डाल रहे हैं वहीं शहरों में अपने घरों को कोठियों में टायल, संगमरमर और वीआईपी पेंटो से गुलजार कर रहे हैं। शहरों में रहकर गांव के  लोगों को बहला फुसला रहे हैं। वही विधायक और सांसद तो देहरादून और दिल्ली में बैठकर पहाड़ की भोली भाली जनता को नए सपने दिखाने के ताने-बाने बुनने में लगे हैं। ग्राम तोली के प्रधान और बबीना के प्रधान को जब फोन किया तो उनके द्वारा न तो फोन रिसीव किया गया नहीं फोन का प्रत्युत्तर देने की जहमत उठाई गई। इससे साफ पता चलता है कि जनप्रतिनिधि क्षेत्र की जनता के लिए कितने समर्पित हैं । स्थानीय निवासियों के अनुसार गर्मी शुरू होते ही पहाड़ों में पानी की किल्लत शुरू हो जाती है परंतु न तो जनप्रतिनिधि और नहीं विभागीय अधिकारी इस ओर ध्यान देते हैं तो फिर कैसे पहाड़ का पलायन रुकेगा। पहाड़ को बर्बाद करने के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधि से लेकर क्षेत्रों के विधायक,सासद पूरी तरह जिम्मेदार हैं। कोई जमाना था जब पहाड़ की का पानी और पहाड़ की जवानी की किस्से हमारे बुजुर्ग सुनाया करते थे, लेकिन अब जो पहाड़ में रह रहे हैं वह यह किस्से सुना रहे हैं कि पहाड़ भूल कर भी मत आना न तो यहां आपको पहाड़ का पानी मिलेगा ना  ही पहाड़ का अनाज,दूध,घी न पहाड़ की सब्जियां दुकानों में न जरूरत का सामान मिलेगा और नहीं रास्ते, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा मिलेगी। इसलिए अगर शहर में हो तो वही बने रहो हम गांव के लोग गांव से  जनप्रतिनिधि बनाकर शहर भेजते रहेंगे और धीरे-धीरे पहाड़ भी खाली करते रहेंगे।

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