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August 5, 2026
रिश्वत का बाजार राजमार्ग
सड़क सुरक्षा की पैरोकारी करने वाले संगठन सेफ लाइफ फाउंडेशन एस एल ऐफ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में राजमार्गों पर सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 48000 करोड़ की रिश्वत तो सिर्फ व्यवसायिक वाहनों को चुकानी पड़ती है । जिसमें स्थानीय पुलिस की भागीदारी सबसे ज्यादा है। राष्ट्रीय राजमार्गों पर रिश्वतखोरी की यह डरावनी तस्वीर इस बात का खुलासा करती है कि इन रिश्वतखोरी के पीछे कौन है , यह लोग कौन हैं, उनको कौन पाल रहा है ,राष्ट्रीय विकास और इमानदारी की बुनियाद में छेद करने वाले लोग कौन हैं , राजमार्गों पर देश की विकासशील संपन्नता पर कौन डाका डाला रहा है , राजमार्गों की सबसे बड़ी पोल खुलती है । रिपोर्ट बताती है कि विगत एक दशक में राजमार्गों पर चल रही रिश्वतखोरी के मामलों में 120% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है । इस डिजिटल युग में भी रिश्वतखोरी की घटना का होना सरकार की मंशा को सवालिया निशान में घेरता है । डिजिटल और सीसीटीवी का कोई लाभ न होना डिजिटल तकनीक का फेल होना दर्शाता है । रिपोर्ट के अनुसार वसूली के विस्तार में जाकर पता चलता है कि स्थानीय पुलिस जहां रिश्वत में हर साल ₹22000 करोड़ ले लेती है वहीं क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय आरटीओ के अधिकारी सालाना 19500 करोड रुपए डकार जाते हैं। इतनी भारी रिश्वत की कीमत अपने पिछड़ेपन से देश के लोग महंगाई भुगत कर चुकाते हैं। सड़कों पर हो रही दुर्घटनाएं का कारण दुर्घटनाग्रस्त अधिकांश वाहनों की वैलिडिटी एक्सपायर होने के बावजूद सड़कों पर चलना बताता है कि एक्सपायरी डेट की यह गाड़ियां किन लोगों की रिश्वतखोरी के आशीर्वाद से सड़कों पर दौड़ रहे हैं , और लोगों की जीवन से खेल रहे हैं । पहाड़ी क्षेत्रों में आए दिन हो रही दुर्घटनाएं आरटीओ और यातायात पुलिस की खामियों को आम जनता भुगत रही है। उत्तराखंड में पिछले एक दशक में केवल वाहन दुर्घटनाओं में 47% की वृद्धि हुई जोकि आरटीओ और यातायात पुलिस की नाकामी बताती है । सड़कों के हिसाब से राजमार्ग पर कर्मचारियों की कमी यातायात पुलिस की कमी भी इसके लिए जिम्मेदार है। लगातार नए-नए राजमार्ग बन रहे हैं , चौड़े भी हो रहे हैं , आम लोगों को परिवहन में पहले की तुलना में ज्यादा सुविधाएं भी मिल रही है , परंतु उसके बावजूद भी सड़क दुर्घटनाओं में कमी ना हो ना कहीं ना कहीं राजमार्ग की खामियां परिवहन विभाग की खामियां यातायात पुलिस की खामियां और सरकार के मनसा की खामियां बताता है । कहने को तो कई हाईटेक राजमार्ग बंने हैं , कई हाईटेक गाड़ियां भी आई है, लेकिन उसके बावजूद वाहन चालकों को सरकार या परिवहन विभाग हाईटेक नहीं बना पा रहा है । पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों का हाल बद से बदतर होता जा रहा है। सरकार को चाहिए कि वह अपने स्तर से जमीनी पड़ताल करें कैसे यह वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं एक्सपायरी डेट के वहां अगर सड़क पर दौड़ते हैं तो दुर्घटनाग्रस्त होने पर उस क्षेत्र के आरटीओ पर समस्त सवारियों के बीमा राशि का जुर्माना होना चाहिए, अगर राजमार्ग में खामियां पाई जाती हैं तो उस राजमार्ग के एक छोटे कर्मचारी से लेकर बड़े अधिकारी तक पर पूरी गाड़ी की सवारियों का इंश्योरेंस का पैसा वसूला जाए ।। साथ ही परिवहन विभाग जिस भी मंत्री के पास है उसे भी जुर्माने की हद में लाए जाए ,तो निश्चित रूप से इस पर काफी हद तक रोक लग सकती है। केवल ड्राइवर या वाहन की कमी बताकर सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती । यातायात पुलिस आरटीओ की खामी या पुलिस की खामी बता कर पीछा नहीं छुड़ा सकती। सरकार को अगर राजमार्ग से संबंधित किसी भी विषय पर निर्णय लेना हो तो इसमें नीतिगत निर्णय बनाने के लिए एसी में बैठे राजनेता, अधिकारी को से नहीं वरन् जो राजमार्ग से संबंधित लोग हैं उनसे मिलकर जो सड़क पर वाहन चला रहे हैं, जो सड़कों का निर्माण कर रहे हैं , और जिन पर इन सड़कों की देखरेख की जिम्मेदारी है उनको भी नीतियां बनाने में शामिल किया जाए। जिससे कि राजमार्गों का परिवहन संचालन में सही निर्धारण हो सके। हमें विभागों पर दोष मढना अच्छा लगता है, लेकिन इसके लिए हमें अपने स्तर से सुझाव भी सरकार को देनी चाहिए कि जो दुर्घटनाएं हो रही हैं उन दुर्घटनाओं के क्या कारण हैं उनका समाधान कैसे होगा केवल खामियां बताने
तक हमारी जिम्मेदारी नहीं बनती।
लोक संवाद टुडे के लिए पुष्कर पवार का आंकलन