मेनू
News

स्वयं -सहायता समूह (SHG) का राजनीतिक दुरूपयोग तो नहीं

रिपोर्टर: Author August 5, 2026
 स्वयं -सहायता समूह (SHG) सांगठनिक आर्थिक ताकत

कहीं स्वयं -सहायता समूहों (SHG) का राजनीतिक दुरूपयोग तो नहीं…..? 

  रिपोर्ट-  पुष्कर सिंह पवार

  स्वयं सहायता समूह की गठन की प्रक्रिया के पीछे बहुत ही दूरदर्शी और सार्थक सोच थी. समूहों के माध्यम से निर्धन से लेकर मध्यम आय वर्गों के लोगों को संगठित कर आर्थिक रूप से सक्षम बनाना था. देश भर में आज लाखों स्वयं सहायता समूह काम कर रहे हैं. कुछ समूह तो आर्थिक क्षेत्र में अपना डंका बजा रहे हैं तो कुछ समूह अपने को सक्षम बनाने के प्रयास में जुटे हैं.
  परन्तु आज अधिकांश सरकारों के राजनीतिक दल इन समूहों का दुरूपयोग कर अपने राजनीतिक हित साधने में जुटे हैं, जिससे समूह अपने उद्देश्य से भटकने लगे हैं. लोक संवाद टुडे आज आपको समूहों को प्रक्षिशित कर उन्हें स्वावलम्बी बनाने वाले प्रशिक्षक कमल बहादुर के अनुभव से ओतप्रोत आलेख के माध्यम स्वयं सहायता समूहों की वास्तविकताओं से परिचित करा रहे हैं.
  आलेख- कमल बहादुर थापा
स्वयं -सहायता समूह (SHG)का राजनैतिक उपयोग समाज विकास को अवरूद्ध करने की गलती या चाल तो नहीं?
विकास में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका  रही है,  जिसने समाज के रुख को निर्देशित किया है. हाल के दिनों में स्वयं-सहायता समूह (SHG) में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से स्वस्थ समस्याओं, आर्थिक स्वावलंबन की मुश्किलों का समाधान तलाशा है, 
इस टिप्पणी का उद्देश समूह की वर्तमान और पूर्व सदस्यों द्वारा रेखांकित उपरोक्त कथन की पड़ताल हैं:
1.भारत में स्वयं सहायता समूहों का उपयोग राजनैतिक हाथियार के तौर पर किया जाता है यह आम बात है, इस बारे में विभिन्न रिपोर्ट्स और अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि की है। यह समूह राजनीतिक दलों द्वारा निर्मित या उनसे संबद्ध हो सकते हैं और आमतौर पर वे चुनावों के समय उन दलों को समर्थन देने में जुटाए जाते हैं।
2.महिलाओं को अनुदान और योजनाओं के प्रलोभन के माध्यम से साधा जाना, उनकी स्वतंत्रता और निष्पक्ष सोच को कमजोर बना सकता है। इससे उन्हें एक खास विचारधारा के प्रति रुझान को बढ़ावा मिलता है और उन्हें सत्ता के करीब लाने के लिए व्यक्तिगत लाभ गिनाए जाते हैं जिससे कई बार आपसी सहसंबंध कमजोर होते हैं साथ ही विशेष बनने के चक्कर में शोषण का शिकार हो जाना भी कुछ नया नहीं है.
3.आमतौर पर, शासन न केवल SHG के उद्यमिता व कार्य में संलग्न होता है, बल्कि वह इन समूहों को संचालित करने के लिए अनुदान भी प्रदान करता है। कई मामलों में इसे अहसान के तौर पे प्रचारित किया जाता है और इस अहसान के बदले उनसे राजनैतिक भीड़ बनने और जुटने की अव्यक्त बंधुआ मजदूरी करनी ही पड़ती है.
4.अनुदान, सब्सिडी एक लत जैसी होती है. मुफ्त के पैसे बस इसी आस में लोग कोई जोखिम उठाने से बचते हैं और उनके सपने और हुनर बस राजनीति चमकाने में लग जाता है और ऐसी सोच के तले लोगो की प्रतिभा और कौशल दम तोड देता है. 
5. राजनीति में समूह तो समूह कैसे राजनीति से बच सकता है? कहां तो समाज सुधारने इक्कठा हुए वहां अंदर ही नूराकुश्ती चलती रहती है.एक बार समूह की इमेज या छप जरा उलझी तो उसे ठीक करना आसान नहीं होता। एक अंग्रेजी कहावत बताती है कि “अगर आपकी समस्या आपको परेशां कर रही है, तो निश्चित है कि यह आपके समस्या का हल नहीं है।” 
आज इस ओर क्या ध्यान देने की  जरूरत है…..?

संबंधित खबरें