क्या उत्तराखण्ड में भाजपा हाई कमान जनता के जनादेश का अपमान कर पराजित और जनता के बीच जाने से कतराने वाले को ताज पहनाएगा ?
उत्तराखंड सिंहासन बत्तीसी = कौन बनेगा मुख्यमंत्री ?
राजनीति एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ सब संभव है चाहे वह जायज हो नाजायज़ । कानूनी हो गैरकानूनी । असंभव हो या संभव । जनता की पसन्द हो या नापसंद । लोकतंत्र के बहाने लोकतंत्र की हत्या भी लोकतंत्र की परीक्षा में शामिल पराजित और विजयी राजनीतिक ही करते हैं ।
उत्तराखंड में अभी विधानसभा चुनाव सम्पन्न हुए हैं । भाजपा को उत्तराखंड की जनता ने पूर्ण बहुमत के साथ जनादेश दिया है । लेकिन जिस तरह 10 दिन तक चुने हुए भाजपा के विधायकों ने या कहें भाजपा हाई कमान ने उत्तराखंड में जनता के जनादेश पाकर सदन में और सत्ता में भागीदारी करने का आशीर्वाद पाया है उसके बावजूद विधायक दल का मुखिया चुनने में दस दिन लगा दिए उससे लोकतंत्र की पवित्रता पर सवाल उठने लाजिमी है । उत्तराखंड के साथ चार अन्य राज्यों में भी लोकतंत्र की परीक्षा में पंजाब को छोड़ भाजपा ने अपने को स्थापित किया । पंजाब में तो सरकार ने लोकतंत्र को सम्मान देते हुए अपना कामकाज पूरे लोकतांत्रिक तरीके और विधि विधान से शुरू कर दिया है । उत्तराखंड सहित चार राज्यों में भाजपा हाई कमान जिस तरह से पराजित और जनता के बीच जाने से कतराने वाले महानुभावों में हाई कमान के चहेतों को एडजस्टमेंट के चिंतन में जुटी है वह लोकतंत्र में जनता का भारी अपमान है । अगर उत्तराखंड सहित अन्य राज्यों में भाजपा हाई कमान पराजित और जनता के बीच परीक्षा देने में कतराने या भागने वालों को सरकार में ताज पहनाती या फिर एडजस्ट करती है तो यह सीधे सीधे लोकतंत्र की हत्या होगी । लोकतंत्र का अर्थ है लोगों की चुनी सरकार । जिस जनप्रतिनिधि को जनता ने नकार दिया निश्चित ही उसमें खामियां होगी । वहीं जो जनप्रतिनिधि जनता की परीक्षा में जाने के बजाय पिछले दरवाजे से सत्ता के सिंहासन पर जाने के सपने देख रहा हो वह कैसे जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा ? भाजपा हाई कमान और जनता के आशीर्वाद से सत्ता के सिंहासन पर पहुंचे माननीयो को पवित्र लोकतंत्र का सम्मान करते हुए चाहिए कि अपने बीच से ही योग्य और कर्मठ जनप्रतिनिधि को मुखिया चुनकर समय से सरकार का कामकाज शुरू करें । वहीँ भाजपा हाई कमान को भी चाहिए कि चुनाव में भेजने से पूर्व जब आपको आपका जनप्रतिनिधि योग्य कर्मठ ईमानदार लगा तो विजयी होंने के बाद वह क्यों सरकार चलाने और मुखिया बनने योग्य नहीं ? वैसे भी भाजपा को प्रयोगधर्मिता की पार्टी का तमगा तो लग ही गया है ।