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August 5, 2026
कोटद्वार हरेला पर्व की धूम
कुमाऊंनी लोगों ने अपने घरों में पूरी-पकौडी-खीर पकवानों से मनाया हरेला पर्व
विभिन्न संगठनों और सरकारी विभागों ने भी वृक्षारोपण कर मनाया हरेला पर्व
कोटद्वार। सावन के पहली तिथि को उत्तराखंड हरेला पर्व की धूम अब धीरे-धीरे राष्ट्रीय पहचान बनाने लगा है। हरेला पर्व केवल उत्तराखंडी लोकपर्व ही नहीं वरन् प्रकृति संरक्षण से लेकर कृषि कार्यों का भी अनोखा प्राकृतिक त्यौहार है। उत्तराखंड सरकार द्वारा त्यौहार की मूल भावना को समझते हुए इसे राजकीय पर्व की पहचान दिलाने में भरपूर योगदान दिया है। वर्तमान में राज्य सरकार की सरकारी मशीनरी से लेकर राज्य के अनेकों संगठन हरेला पर्व को प्रकृति से जुड़कर पूरे विश्व को पर्यावरण संतुलन और संरक्षण दे रहे हैं।
कुमाऊं में हरेला पर्व से कृषि कार्यों की शुरुआत करने की परम्परा रही है।बाबर में जहां धान रोपाई से लेकर विभिन्न पहाड़ी दलहनी फसलों,बेल वाली ( कद्दू वर्गीय ) फसलों की बुवाई शुरू करने की परम्परा रही है।समय के साथ धीरे-धीरे इसमें बदलाव आ गया है। वहीं हरेला पर्व पर फलदार पौधारोपण की परम्परा है,माना जाता है कि हरेला पर्व पर लगाए गए पौधे व फसल बहुत अच्छी होती है व खराब/नुक़सान नहीं होता। कुमाऊं हरेला की विधि विधान से पूजा के बाद दिया जाने वाला आशीर्वाद भी बहुत अनूठा और ह्रदय की गहराइयों को छूने वाला है। यथा –
जी रये जागी रये,यौ दिन बार भेटने रये ।
जी रये जागी रये,यौ दिन बार भेटने रये ।
दुबड़ जस फैलने रये,बेरी जस फैलने रये।
हिमांलु में हृयुन छन तक,गंगा जी में पाणी छन तक।
भेटने रया।
अगाश जस उच्च है जये, धरती जस चकाव है जाये।।
स्याव जस बुद्धि है जवो,स्यूं जस तारण है जवों।
जी रये, जागी राए,यौ दिन बार भेटने रये।।



