उत्तराखंड राज्य निर्माण करने वाले उत्तराखंड क्रांति दल की उपेक्षा क्यों….?
उत्तराखंड राज्य को बने हुए 20 वर्ष से अधिक हो गए हैं इन 20 वर्षों में राज्य में बीजेपी और कांग्रेस ने दो-दो बार सत्ता संभाल कर राज्य की जनता की अपेक्षाओं को केवल सपना तक सीमित रखा उसके अलावा राज्य की जनता को लगातार मुंगेरीलाल के सपने ही दिखाते रहे आप फिर से राज्य में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं इस बार भी जनता को लुभाने के लिए भाजपा कांग्रेस पूरी तरह एंडी चोटी का जोर लगाकर सुनहरे सपने दिखाकर सत्ता पर कब्ज़ा जमाने के लिए कुछ भी करने के लिए तैयार है चाहे वह नेताओं की अदला-बदली हो,लुभावना घोषणा पत्र हो, जाति-पाति का कुचक्र हो, पहाड़ मैदान का घमासान हो,या फिर क्षेत्रवाद। भाई भतीजावाद के उत्तराखंड के पाखंड को उत्तराखंड की बुद्धीमान और बौद्धिक परिपक्वता की ठेकेदार मानने वाली जनता फिर से भाजपा कांग्रेस के जाल में किसी गुलाम की तरह सिमट कर रह जाएगी।
उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए जिस पार्टी ने अपना, अपने परिवार, राज्य की महिलाओं, माता-बहनों, युवाओं और छात्र छात्राओं के बलबूते राज्य बनाने के बलिदान दिया और दिलवाया वहीं क्षेत्रीय पार्टी उत्तराखंड क्रांति दल बड़े राष्ट्रीय दलों के शतरंज की चाल कहें या फिर मकड़जाल में उलझी कर अपने अस्तित्व को बचाने के लिए फिर उत्तराखंड की जनता के बीच अपनी खामियों, बचपने और राज्य को बचाने की पीड़ा के साथ जनता से सरकार बनाने नहीं वरन राज्य की जनता को राज्य की बरबादी करने वालों का चेहरा दिखाने की कोशिश करने में जुटी है। उत्तराखंड राज्य बनाने का उद्देश्य राज्य के जल, जंगल, जमीन, पलायन की त्रासदी, महिलाओं के सर से घास लकडी का बोझा कम करने, पहाड़ के दूरस्थ इलाकों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क पहुंचाने का था,न कि पहाड़ के जल, जंगल, जमीन को माफियाओं को सौंपने और राज्य की सम्पत्तियों को औने-पौने दामों पर बेचकर धनकुबेरों को ताकतवर बनाने के लिए। जिस धार्मिक तीर्थस्थल के लिए राज्य जाना जाता था वह प्रदेश नशे के कारोबार से जाना जाने लगा है। धार्मिक स्थलों के पास शराब की फैक्ट्रियों का खुलना,स्मैक जैसे जहर का पहाड़ युवा पीढ़ी को बर्बादी की ओर धकेलने वालों को बढ़ावा देना,पहाड़ की जीवनदायिनी नदियों का सरकारी संरक्षण में चीर हरण करने वालों को प्रोत्साहित करना पिछली सरकारों का राज्य की जनता को प्यारा और खुशहाली का तोहफा है। उत्तराखंड क्रांति दल ने देर सबेर अपने चंद साथियों व कार्यकर्ताओं के साथ उपरोक्त मामलों में संघर्ष तो किया लेकिन राज्य की भाजपा कांग्रेस प्रेमी जनता का सहयोग मिलने के अभाव में खुद ही बिखर कर रह गई है। उत्तराखंड की जनता को सरकारों को गालियां देना , खामियां निकालना व मिडिया जगत को कोसना तो सुहाता है लेकिन कुंए के मेंढक की तरह उछल-कूद करने से राज्य तो सुधरने से रहा, क्योंकि जब तक जनता जनार्दन स्वयं के निर्णयों का अब तक का आंकलन कर बदलाव करने का जज्बा नहीं पैदा नहीं करेगी तब तक कोई परिवर्तन नहीं होने वाला। पांच साल फिर चेहरा बदलने या रिपीट करने से जनता का भाग्य नहीं बदलेगा, बदलेगा तो राष्ट्रीय पार्टियों का। पूरा देश बदल गया, डिजिटल हो गया, राज्य की जनता भी डिजिटल हो गई लेकिन मानसिकता राज्य की जनता की बंद घड़ी की तरह भाजपा कांग्रेस में ही अटकी पड़ी हुई है। अब देखना यह है कि अबकी बार भी क्या राज्य की जनता कुंए के मेंढक की भूमिका में राज्य में सरकार बनाएगी..…?