उत्तराखंड का लोकपर्व घी संक्रांति
‘ओलकिया’ या ‘ओलगी’ और टेक्टा संक्रान्त के नाम से भी उत्तराखंड में प्रचलित है त्यौहार
प्रकृति, कृषि और पशुपालन को महत्ता देता है त्यौहार
फोटो – पुष्कर सिंह पवार
जब कुमाऊं के इलाकों में चंद राजाओं का शासन था तब शिल्पी लोग इस दिन अपनी कारीगरी और दस्तकारी की चीजों को दिखाकर पुरस्कार पाते थे ।ऐसे लोग जो खेती का काम करते वह साग-सब्जी, दही दुग्ध, मिष्ठान और अन्य प्रकार की बढ़िया चीजें दरबार में ले जाते। इस तरह की प्रथा ओलग देने की प्रथा कहलाती थी।
ओलग दरबार के अतिरिक्त अन्य मान्य व्यक्तियों को भी दिया जाता था। जैसे लड़की का ससुराल पक्ष उसके मायके पक्ष को केले की घडी, ककड़ी, गाबे, मूली, घी आदि दिया करते। कई स्थानों पर ओल्गा भेंटने की भी परम्परा है।
आज के दिन पहाड़ी परिवारों में खूब पकवान बनाये जाते हैं। पूड़ी, उड़द की दाल की पूरी व रोटी, बड़ा, पुए, मूला-लौकी-पिनालू के गाबों की सब्जी, ककड़ी का रायता और खीर हर पहाड़ी के घर में बनते हैं। आज के दिन के भोजन में खूब सारा घी डालकर खाया जाता है। आज के दिन जो घी नहीं खाता वह अगले जन्म में गनैल (घोंघा )बनता है की कहावत चरितार्थ है।
पहाड़ में खेती किसानी के साथ पशु पालन होता आया है अनाज, फल फूल और सब्जी के साथ गाय बैल, भैंस बकरी और सीमांत इलाकों में भेड़, याक व अन्य पशु दूध दही, मक्खन, व घी के साथ उपज के लिए समुचित खाद प्रदान करते रहे हैं कुमाऊं में भादों मास की संक्रांति घ्यूँ त्यार मनाया जाता है। इसे ‘ओलकिया’ या ‘ओलगी’ संक्रान्त भी कहते हैं। इस दिन घी खाने की परंपरा चली आ रही है। इस कारण इसे घ्यूँ त्यार या घी संक्रांति भी कहा जाता है।
घी त्यार को ओलगी संक्रांति भी कहते हैं. ओलकिया संक्रांति में उर्द या मॉस की दाल भिगा उसके छिल्के बहा सिलबट्टे में खूब पीस, नमक, हींग, अजवाइन, लाल खुस्याणी, आद या अदरख मिला बड़े बनाते हैं। आटे की लोई में इसे भर पूरी और लगड़ भी बनते हैं। उड़द की पिसी दाल को आटे की लोई के भीतर भर तवे में सेक और फिर चूल्हे की आग में सेक ऊपर से घी चुपड़ ‘बेडुआ’ रोटी भी बनाई जाती है। सीप वाली महिलाएं बिना चकला बेलन के ही बेडुआ रोटी हाथ में ही पाथ देतीं हैं ऐसे जतन से कि पूरी रोटी के भीतर उड़द का मसाला बराबर रहे, बराबर सिके।
खेती किसानी और पशु पालन से जुड़ा होने के कारण यह विशेष त्यौहार है। सावन भादों में अक्सर गाय भैंस ब्याए रहते हैं। हरे चारे की कमी नहीं होती। दन्याली यानि दूध दही घी बहुतायत में होता है। इसी कारण घी त्यार में हर घर में घी से बने स्वादिष्ट पकवान बनाये जाते हैं। बच्चों के कपाल में भी मक्खन या घी चुपड़ा जाता है।
इष्ट-मित्रों को ओलग भेंट की जाती है। जिसमें घी, दही, पापड़ या पिनालू के डंडी में मुड़ गए पत्ते या ‘गाक’ और अन्य पकवान बना कर मित्रों के घर भेंट करने ले जाते हैं। इसके साथ ही मौसमी फल, केले, हरी सब्जी, मूली गोरस और घी भी ओलक में दिया जाने की परम्परा है । रिवाज यज्ञ भी था कि आसामी द्विज वर्ग के घर ओलुक भेंट करने जाते थे तो साथ ही रोपाई वाले खेतों में पाती तथा मेहल की टहनियों को रोपते जहां ओलुक भेंट करनी होती उस घर के दरवाजे के पास की भूमि पर भी ये टहनियां रोप देते।
शिल्पकार लोग अपने हुनर से बनाई वस्तुओं की भेंट भी प्रदान करते जिनके साथ छिलुके, पत्तल धागा व घुइयां की मुड़ी पत्तियां होतीं। ब्राह्मणों, पुरोहित पंडितों,लाला महाजन को ओलुक भेंट दिया जाता जिसके बदले उन्हें अनाज, कपड़ा, पकवान व रूपया पैसा मिलता।
विवाहित कन्याएँ अपनी ससुराल से मायके को ‘ओल’ ले जातीं। ओलकिया संक्रांति के दिन गाय भैंस इत्यादि जानवरों के जंगल जाने वाले रस्ते किसी पेड़ को काट उसकी शाखाएं काट खतड़ुए का रोपण करना भी कई जगहों में प्रचलित रहा। ओलुका एक तरह से फल-फूल, साग-पात, गोरस-घी का उपहार है जो भादों में दिया जाता है। सब लोगों में आपसी मेलजोल बना रहे और इसी बहाने शरीर को भी घी दूध मिले, बंटे यही इसका शकुन रहा है। इसीलिए यह प्रकृति और कृषि से जुड़े होने के कारण आज भी महत्वपूर्ण है।
कुमाऊं में जहां घी त्यार मनाया जाता रहा वहीं टिहरी गढ़वाल की जलकुर घाटी में “टेक्टा” मनाया जाता है जिसमें भी गोरस का प्रयोग होता है. घरों की साफ सफाई होती है और विवाहित कन्याएँ ससुराल से मायके आतीं हैं. यह संक्रान्त से दो गते तक मनाते हैं. इसका खास उद्देश्य अपने पितरों को भोग लगाना है. इसमें खासतौर पर खीर बनाई जाती है और लगड़ या लगडी तली जाती है।
रात को परिवार के सयाने अपने घर के बाहर लकड़ियां जलाकर साथ में हुक्का-चिलम और अर्जुना घास रख देते हैं। पत्तल या पत्रों में खीर रखी जाती है। घास से साफ सफाई कर पितर खीर खाएंगे और फिर चिलम गुड़गुड़ाएंगे, यह लोक मान्यता है। इस इलाके में टेक्टा के साथ ही साल में पड़ने वाले त्योहारों की शुरुवात भी मानते हैं।



