उत्तराखंड का प्रकृति और कृषि से जुडा लोकपर्व हरेला
विशेष कर कुमाऊं व गढ़वाल कुमाऊं की सीमाओं से सटे पहाड़ के गांवों में शताब्दियों से चली आ रही परम्परा के अनुसार पहाड़ के लोग अपने-अपने घरों में हरेला बोया करते हैं। हरेला बुआई का मतलब है टोकरी भर मिट्टी में पांच, सात या नौ तरह के अनाजों के बीज बोए जाते हैं जिनमें मुख्यतः जौ, गेहूं, मक्का, गहत, सरसों, उड़द और भट्ट जैसे अनाजों के बीच रिंगाल,बांस की टोकरी हरेला बोना शुभ माना जाता है।
रिंगाल या बांस की यह टोकरी अगले नौ-दस दिन घर के भीतर अपने ईष्ट के थान यानी मंदिर के सामने रखी जाती है। नित्य ईष्ट वन्दना के समय के यह इसमें पानी भी डाला जाता है। सावन महीने की पहली तारीख को टोकरी में उपजी अनाज की हरी पत्तियों को काटा जाता है और अपने ईष्ट को चढ़ाने के बाद प्रत्येक उत्तराखंडी पहाड़ी अपने कान के पीछे इन्हें सजाता है।
उत्तराखंड के अलग-अगल इलाकों में हरेला मनाये जाने का समय भी अलग है। वैसे तो यह वर्ष में कुल तीन बार मनाया जाने वाला व एक बार सावन के पहली तिथि में यह त्यौहार मनाया जाता है। जिसमें दो बार तो नवरात्रों में व हरेला सावन महीने की पहली तारीख को ही मनाया जाता है। इसी प्रकार हरेला किस दिन बोया जाता है इस पर भी अलग-अलग मत हैं। कुछ जगह हरेला सावन की पहली तारीख से 11 दिन पहले, कुछ दिन 10 तो कुछ जगह 9 दिन पहले हरेला बोने की परम्परा है।
हरेला उत्तराखंड के पहाड़ियों का एक पारम्परिक लोक पर्व है। इस दिन उत्तराखंडी पहाड़ियों के घर विभिन्न पकवानों की खुशबू से महकते हैं। हरेला काटने के बाद इसे घर के दरवाजों पर गोबर के बीच डालकर सजाया जाता है। घर की बुजुर्ग महिला घर के सभी सदस्यों के सिर पर हरेला रख उन्हें शुभाशीष देती हैं। ऐसा कोई सदस्य जो अपने घर से दूर रहता हो उसके पास किसी तरह हरेला पहुंचाने की पूरी कोशिश रहती।
लोक संवाद टुडे सभी देशवासियों से अनुरोध करता है कि हरेला के पावन अवसर पर प्रकृति और पर्यावरण को बचाने के लिए अपने परिवार के साथ मिलकर अपनी या सुरक्षित सार्वजनिक जगह पर एक पेड़,पौधा अवश्य लगाएं और धरती को प्रदूषणमुक्त बनाने में योगदान दें।