आजाद हिंद फौज के सैनिक मुरली सिंह रावत ने पूरे किए 102 बसंत, प्रवेश किया 103वें वर्ष में
आजादी से पूर्व देश को आजादी दिलाने वाले बहादुर योद्धाओं में शामिल नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज की निर्भिक सेना का हिस्सा रहे लै. मुरली सिंह रावत को पूर्व सैनिक सेवा परिषद द्वारा 102 वर्ष पूरे होने पर उनके निवास स्थान पर सम्मानित किया। पूर्व सैनिक सेवा परिषद के सभी सम्मानित सदस्यों ने आदरणीय श्री मुरली सिह रावत जी को फूलमाला व शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया।
लोक संवाद टुडे वेव पोर्टल के संपादक पुष्कर पवार द्वारा पूर्व सैनिक कै. गोपाल जखमोला के सहयोग से आजाद हिंद फौज के बहादुर, निर्भीक सैनिक लै. मुरली सिंह रावत जी के देश की आजादी दिलाने में स्वतंत्रता सेनानी जीवन काल के विषय में पाठकों के लिए कुछ यादगार पलों को बताने का प्रयास किया है। जीवन परिचय
मुरली सिंह रावत जी का जन्म 10 अक्टूबर 1919 में ग्राम खैंडूडी, पट्टी मल्ला ढांगू पौड़ी गढ़वाल में हुआ। मुरली सिंह रावत जी ने 13 वर्ष की आयु में प्राइमरी स्कूल बड़ौत से कक्षा 4 पास किया। इसके बाद 18 वर्ष की आयु में मुरली सिंह रावत जी ने एंग्लो वर्नाक्यूलर स्कूल सिलोगी में 1937 में आठवीं कक्षा उत्तीर्ण की।
सैनिक जीवन की शुरूआत और आजादी का संघर्ष
18 वर्ष की आयु में हुए 24 सितंबर 1937 को आर्मी ट्रेनिंग सेंटर लैंसडाउन में गढ़वाल राइफल्स में भर्ती हूए। 3 वर्ष तक मुरली सिंह रावत जी बटालियन के साथ रहे, उसके बाद एक अक्टूबर 1940 को पदोन्नत हुए सेकंड वर्ल्ड वार में बटालियन को सिंगापुर मलाया जाने का आदेश हुआ। उस समय प्रत्येक बटालियन से आठ नंबर ब्रिगेड हेड क्वार्टर में जाने के लिए कुछ आदमियों की छंटनी हुई मुरली सिंह रावत जी भी ब्रिगेड में जाने के लिए चुन लिये गये और बटालियन से अलग होकर ब्रिगेड के साथ सिंगापुर जाने के लिए रवाना हुए। दिनांक 13 नवंबर 1940 को सिंगापुर में पंहुचे।कुछ दिन बिदादरी कैंप में ठहर कर कोटा- मारू के लिए रवाना हुऐ, 8 दिसंबर 1941 तक वहीं रहे। इसी दिन जापान ने अचानक हमला कर दिया अंग्रेजी फौज जापानी फौज के सामने कुछ नहीं कर सकी फलस्वरूप 15 फरवरी 1942 को अंग्रेजों ने जापानियों के सामने बिना शर्त के आत्मसमर्पण किये गये यानी (सिंगापुर फाल हुआ ) उसके बाद जापानियों के कैदी के रूप में कूलांग नाम स्थान पर रहे।
सन 1942 में जापान के मेजर फ्यूजीवरा जी द्वारा सब सैनिकों को कैप्टन मोहन सिंह के हवाले कर दिये गये। मोहन सिंह के नेतृत्व में आए एन ए का गठन हुआ। परंतु कुछ समय बाद राज बिहारी बोस और मोहन सिंह के बीच मतभेद हो गए इसलिए राज बिहारी बोस ने जापान सरकार से कहा कि मोहन सिंह को गिरफ्तार किया जाए। जापान सरकार ने मोहन सिंह को गिरफ्तार कर लिया। इसलिए आई एन ए में बिखराव हो गया,तब रासबिहारी बोस ने आई एन ए को संभालने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जर्मनी से सिंगापुर बुलाया। नेता सुभाष चंद्र बोस 4 जुलाई 1943 को जर्मनी से सिंगापुर पहुंचे तो उनके नेतृत्व में आई एन ए आजाद हिंद फौज का गठन हुआ । उस समय जगह-जगह ट्रेनिंग स्कूल खोले गए। ऑफ़िसर ट्रेनिंग स्कूल निसून कैंप सिंगापुर में खोली गई । मुरली सिंह रावत जी ने भी 1943 में निसून कैंप में ओ टी एस पास कर ली,और लेफ्टिनेंट के पद पर उनकी नियुक्ति चौथी गोरिल्ला रेजिमेंट याने नेहरू रेजिमेंट में कर दी गई । इस रेजिमेंट के कमांडर कर्नल जी एस ढिल्लन थे। नियांगू पोपाहिल और इरावदी मोर्चे अंग्रेजों से भयंकर लड़ाई लड़ी। मनीपुर मौराग में 14अप्रैल 1944 को पहला तिरंगा फहराया गया। बाद में समय के अनुकूल न होने के कारण सफलता प्राप्त नहीं हो सकी। इसके बाद नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आदेशानुसार आजाद हिंद फौज ने मई 1945 को आत्मसमर्पण किया। उसके बाद मुरली सिंह रावत भी अन्य साथियों के साथ इंसान जेल रंगून में रहे,वहां पर अंग्रेजों की सैनिकों पर कड़ी निगरानी थी । 9 माह वहां रहने के बाद माह जून मैं वहां से छूटने के बाद पानी के जहाज से भारत के लिए रवाना हुए और कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता पहुंचने के बाद अंग्रेजों द्वारा सभी सैनिकों पर कड़ी निगरानी रखी गई ।वहां पर जिगरगच्छा स्थान पर अंग्रेजों द्वारा उनके बयान लिए गए, और अधिकांश सैनिकों को ब्लैक कैटेगरी में रखा गया। कुछ दिन के बाद वहां पर कैद रहने के बाद बरसात कैंप में भेजा गये। वहां जाने के बाद नीलगंज में भेजे गये, प्रत्येक स्थान पर सभी सैनिकों के बयान लिए गए। अधिकांश सैनिकों बयान दिया था रहा कि मैंने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी और इसलिए मै आजाद हिंद फौज में सम्मिलित हुआ। उसके बाद हम ब्लैक कैटिगरी वालों को नीलगंज जेल में रखा गया, उसके बाद अंत में दिनांक 21 फरवरी 1946 को उन्हें नीलगंज जेल कैंप से अंग्रेजों द्वारा मुक्त किया गया और उसके बाद में 7 वर्ष बाद अपने घर चले आये। घर वालों को कोई जानकारी नहीं थी कि वे घर वापस आएंगे या नहीं जब वे घर पहुंचे तो उनके माता पिता ने खुशी के आंसू रोक न सके। फिर 7 साल के बाद घर आने पर घर में सभी लोगों को निमंत्रण दिया गया एवं खुशी मनाई गई।
आजादी के बाद का सफर
1947 में सेकेंड बटालियन होमगार्ड की स्थापना कानपुर में हुई उसी में मुरली सिह रावत जी चले गये जिसमें कर्नल बुद्धि सिंह रावत और कर्नल पित्रशरण रतूड़ी भी थे। 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हो गया फिर होमगार्ड टूट गई ।
2 अप्रैल 1948 को 13वीं बटालियन पीएसी में हवलदार के पद पर भर्ती हुए सीतापुर कुछ दिन बाद वे 11 वीं बटालियन पीएसी में सीतापुर आ गये। सन 1951 में कंपनी के साथ हैदराबाद ड्यूटी पर गए। 1952 में आप हैदराबाद से सीतापुर आये। उसके बाद स्थानांतरण 9 बटालियन पीएसी मुरादाबाद में हो गया।उसके बाद में 1953 में अपनी कंपनी के साथ उत्तरकाशी बॉर्डर गये, 1956 फिर मुरादाबाद वापस आये,1961 में प्लाटून कमांडर के पद पर उत्तरकाशी बॉर्डर चले गए।
1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था वह नीलांग में थे तो चीनियों की एक पेट्रोल पार्टी नीलांग के नजदीक पहुंच गई थी परंतु उनकी पार्टी ने चीन की पार्टी को वापस खदेड़ा । सन 1963 से 1967 तक अस्कोट व जोशीमठ सैक्टर में रहे सन 1974 में आप सेवानिवृत्त होकर वापस घर आ गए। तब से लै. मुरली सिंह कोटद्वार में रहकर युवाओं को देश सेवा के लिए प्रेरित कर रहे हैं। लै. रावत अपने 102 साल की उम्र में पूरी तरह स्वस्थ हैं।