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सुखरौ नदी में मानकों के विपरीत खनन होने पर जिम्मेदार अधिकारियों को बर्खास्त करने और जेल के सीखचों के पीछे भेजने की मांग

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

 सुखरौ नदी में मानकों के विपरीत खनन होने पर जिम्मेदार अधिकारियों को बर्खास्त करने और जेल के सीखचों के पीछे भेजने की मांग


कोटद्वार नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत सुखरौ नदी में रिवर ट्रेनिंग के नाम पर हो रहे मानकों के विपरीत खनन को लेकर उमेश चंद्र नौटियाल ने जिलाधिकारी से शिकायत दर्ज कराई है। उमेश चंद्र नौटियाल के अनुसार सुखरौ नदी में रिवर ट्रेनिंग के नाम पर सिंबल चौड और खूनीबड़ मैं जहां गांव की भूमि को 7- 8 मीटर तक खोद दिया गया है वहीं वन भूमि क्षेत्र में भी नदी को 7 से 8 मीटर तक खोदकर मानकों की धड़ल्ले से धज्जियां उड़ाई गई है। नौटियाल की माने तो रिवर ट्रेनिंग के नाम पर राज्य सरकार पर्यावरण मंत्रालय के दिशा निर्देशों के ठीक विपरीत जिला प्रशासन ने जिस तरह खनन पट्टे आवंटित किए हैं और खनन पट्टों को ग्राम भूमि तथा वन भूमि में पट्टा धारकों को मानकों के विपरीत खनन करने दिया जा रहा है, वह पूरी तरह से गैरकानूनी है। जिला प्रशासन द्वारा खनन पट्टों की अनुमति जून 30 तारीख तक की दी जाती थी लेकिन उत्तराखंड राज्य में पहली बार देखने को मिल रहा है कि खनन जुलाई और अगस्त में भी जारी है। सिंबलचौड़ में सुखरौ नदी में खसरा नंबर 103 और बलभद्रपुर में सुखरौ नदी में खसरा नंबर 1 में यह खनन किया जा रहा है। 1961 में जारी भू नक्शा के अनुसार बलभद्रपुर और सिंबलचौड़ कि वन भूमि में यह खनन भारी मशीनों से किया जा रहा है। 6-7 पोकलैंड  मशीनें दिन-रात अगस्त माह में भी खनन में जुटी हुई है। रीवर ट्रेनिंग नियमों के अंतर्गत रिवर ट्रेनिंग का काम उस स्थान पर किया जाता है जिस स्थान पर नदी का तल ग्रामीण भूमि से ऊपर पहुंच गया हो, परंतु कोटद्वार में तो इसके लिए प्रशासन की अनुमति के चलते सारे नियम कायदे तोड़कर जमीन के तल से नीचे 6-7 मीटर तक खनन काम किया जा रहा है, जिस कारण खेती योग्य भूमि नदी में टूट टूट कर गिर रही है जिससे किसानों को भारी क्षति पहुंच रही है। धन्य है कोटद्वार प्रशासन और जिला प्रशासन पौड़ी के अधिकारी जिनको रात दिन खनन होते नहीं दिख रहा है। खनन कारोबारी नियमों को अपनी जेब में लेकर चल रहे हैं। उमेश नौटियाल के अनुसार कानूनों की धज्जियां उड़ा कर खनन की अनदेखी कर रहे और संयुक्त रूप से निरीक्षण कर खनन के लिए उपयुक्त आख्या देने वाले अधिकारियों तथा मानकों के विपरीत खनन रोकने में विफल  जिम्मेदार अधिकारियों को तुरंत बर्खास्त कर जेल के सीखचों  के पीछे भेजा जाए। कोटद्वार में मानकों के विपरीत और बरसात के मौसम मौसम में पर्यावरण विभाग का दामन भी प्रदूषित दिखाई दे रहा है। 

उत्तराखंड में अपनी जल, जंगल और ज़मीन की ताकत !

उत्तराखंड के लोगों की जल, जंगल और जमीन का है तो पूरी तरह छिन चुका है, क्योंकि जल फाइव स्टार होटलों को और बाद बनाकर बिजली भी धन्ना सेठों को सब्सिडी में पहुंचाई जा रही है और बिल भुगतान कर रही राज्य की बेबस जनता। जंगल से उत्तराखंडी मकान और हर बनाने के लिए लकड़ी नहीं ला सकता, राज्य के लोगों के लिए सड़क, बिजली पानी की लाइन नहीं जा सकती, परन्तु आलवैदर रोड़ के नाम लाखों पेड़ काटे जा सकते हैं! बड़े बड़े रिजोर्ट और ऐशगाह बनाए जा सकते हैं। अपनी ज़मीन से राज्य का आदमी मिट्टी नहीं खोद सकता,नदी से रेत,बजरी पत्थर नहीं ले सकता अपना घर बनाने के लिए लेकिन सरकार पट्टे धारकों इन सबका व्यापार करने दे सकती चाहे कानून बदलना पडे,तोडना पड़े सब संभव है।

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