मेनू
News

कोटद्वार में क्षत्रियों का राजनीति में दुरूपयोग

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

 कोटद्वार में  क्षत्रियों का राजनीति में दुरूपयोग

राजनीति का अर्थ है देश और राज्य में शासन करने के लिए नितियों को बनाने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया के तहत देश और राज्य में सभी नागरिकों को समानता के दृष्टिकोण से नीतिगत निर्णय लेकर कानून बनाने काम करना। देश की आजादी के बाद से लेकर अब तक राजनीति में कई बदलाव देखने को मिले, उलटफेर देखने को मिले और तो और राजनीति का घिनौना और विकृत रूप भी देखने को भी मिला।

वर्तमान में  क्षेत्रीय राजनीति की बात करें तो उत्तराखंड राज्य बनने के बाद से ही लगातार राजनीति का बहुत ही विकृत  रूप देखने को मिला है। राजनीति न कर निजी स्वार्थों के लिए एक छोटे से राज्य का बेड़ा गर्क कर के रख दिया है। राजनीतिज्ञों ने अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति के लिए भाईचारा खत्म करने काम,भाई से भाई,देशी पहाड़ी, ठाकुर, ब्राह्मण, मुस्लिम, बनिया, एससी एसटी श्रेणी बनाकर मानवता को शर्मशार करने का काम किया है। आम आदमी को आपस में लड़ा कर और जाती पाती, धर्म, संप्रदाय में बांटकर अपना उल्लू सीधा करने के अलावा कोई ऐसा काम नहीं किया जिससे कि राज्य की जनता यह कह सके कि हमें राज्य बनने के बाद कोई बड़ी उपलब्धि हासिल हुई हो। 

कोटद्वार में भी राज्य बनने के बाद से पिछले 20 सालों से लगातार राजनीति का बहुत ही विकृत और भयावह रूप देखने को मिला है।  कोटद्वार की राजनीति में चाहे वह पंचायत स्तर की राजनीति हो नगर क्षेत्र की राजनीति हो या राज्य स्तर की राजनीति हो लगातार धर्म की राजनीति संप्रदाय की राजनीति और जाति की राजनीति पर चुनाव में  हार जीत की शतरंज बिछाकर जीत हासिल करने का मंत्र जपा जाता हैं। कोटद्वार एक क्षत्रिय बहुल विधानसभा है। कोटद्वार में क्षत्रियों की जनसंख्या 60% के लगभग बताई जाती है और अब तक 20 वर्षों में कोटद्वार में राज्य की राजनीति में क्षत्रियों ने ही अपना कब्जा जमाए रखा है। जाति की इस लड़ई  राष्ट्रीय स्तर की राजनीति करने वाले राजनीतिज्ञों को भी धूल चाटने पर विवश होना पड़ा है। कोटद्वार में भी जातियां केवल वोट बैंक का काम करती नजर आई हैं। बहुसंख्यक क्षत्रियों ने भी राजनीति के खिलाड़ियों का मोहरा बन इन 20 वर्षों में अपना खूब इस्तेमाल करवाया है। वहीं जिन क्षत्रियों ने कोटद्वार से राज्य की राजनीति में अपना वर्चस्व जमाया है उन्होंने कोटद्वार विधानसभा में क्षत्रियों की बहुसंख्यता का लाभ उठाकर लगातार क्षत्रियों का ही शोषण किया है। 20 वर्षों से कोटद्वार का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षत्रिय राजनीति करने वाले विधायकों को ही ले लें अभी तक शायद ही उन्होंने अपनी दूसरी लाइन के लिए किसी दूसरे क्षत्रियों को दूसरी पंक्ति के लिए तैयार किया हो। इन राजनीतिज्ञों द्वारा अपनी राजनीतिक पार्टी में पार्टी के संगठनों में अपने लिए रात-दिन एक कर समर्थन जुटाने, जीत की गणित बिठाने करने वाले क्षत्रिय समर्थकों को सम्मान देने के बजाय, चापलूस, चुगलखोर, मौकापरस्त तथा अन्य जातियों के लोगों को ही महत्व दिया है।

 वर्तमान भाजपा विधायक मंत्री को ही ले लो, या फिर पूर्व मंत्री की टीम पर नजर डालोगे तो पूरी फ़िल्म स्क्रीन पर नजर आ जाएगी।  साफ नजर आएगा कि कोई भी कोटद्वार का क्षत्रिय राजनितिज्ञ जो क्षत्रियों के कंधे पर चढ़कर राज्य की राजनीति कर रहा हो क्षत्रियों को व्यवस्थित करते नजर आते हो हां अपने पारिवारिक संबंधियों से जरुर  रिश्तेदारी निभाते जरूर नजर आते हैं। कोटद्वार में वर्तमान विधायक और मंत्री ने तो लगता है कोटद्वार में परशुराम की तरह क्षत्रियों के विनाश की कसमें खाई हो। कोटद्वार में हो रहे विकास कार्यों के कार्यों में शायद ही क्षत्रिय को किसी प्रोजेक्ट में देखा जा सकता है, क्या कोटद्वार के क्षत्रियों में विकास कार्य करवाए जाने की क्षमता नहीं ….? क्या कोटद्वार के क्षत्रियों ने पहले कोई विकास कार्य के कार्य नहीं करवाए…? जो क्षत्रिय चुनाव जैसे संग्राम में दिग्गज प्रतिद्वंद्वियों की शतरंज की चालो को पिटे मोहरों में बदल सकता है क्या वह इह योग्यता नहीं रखता कि विकास कार्यों में वह भी अपनी भूमिका निभाए ? अल्पसंख्यक वोट बैंक, या अनुसूचित जनजाति का वोट बैंक इन्हें तो केवल वह अपनी जेब का बटवा समझकर इस्तेमाल करते हैं। अगर यही रवैया रहा तो 2022 में क्षत्रियों  को सोचना होगा कि वह क्षत्रिय को चुनें या अन्य समुदाय को। 

संबंधित खबरें