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दिल्ली नगरनिगम की हार भाजपा के लिए पांच राज्यों में जीत की राह में कांटे

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

 दिल्ली नगरनिगम की हार भाजपा के लिए पांच राज्यों में जीत की राह में कांटे 

जनता से बेरूखी पड़ेगी भारी 

किसान आंदोलन व किसानों की उपेक्षा भी बन सकता पांचों राज्यों में चुनावी मुद्दा

दिल्ली में नगर निगम चुनाव में बीजेपी का सफाया होना बहुत कुछ भाजपा की कार्यशैली पर सवालिया निशान लगा चुका है। चुनाव परिणाम दिल्ली तक सीमित नहीं है, दिल्ली में हारने का मतलब बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व पर सवालिया निशान दिखाता है जो बीजेपी “सबका साथ सबका विकास” की बात कहती है फिर अपनी केंद्रीय राजधानी में सफाई की कगार पर क्यों पहुंच गई….? यह केवल आप की जीत कहिए या आपके द्वारा कमल के फूल को झाड़ू लगाकर सफाया करना तक सीमित नहीं है। क्योंकि राजधानी दिल्ली में देश के हर कोने कोने और प्रत्येक राज्य का निवासी निवास करता है।  नगर निगम के स्थानीय चुनाव भले ही हो परंतु उस पर केंद्र की सरकार की कार्यप्रणाली का प्रभाव तो पड़ता ही है फिर अधिकांश नगर निगमों में भाजपा का ही कब्जा रहा है। दिल्ली के स्थानीय लोगों की स्थानीय समस्याएं हो सकती हैं जो दिल्ली के लोगों की जरूरत है उसे शायद आप ने महसूस किया और वह क्षेत्रवाद, भाषावाद और जातिवाद से हटकर आम जनमानस की समस्याओं को छूने में कामयाब रही है। वहीं भाजपा दिल्ली में आम जनमानस की भावनाओं सत्ता के दंभ में नकारती रही,जिसका परिणाम यह हुआ कि दिल्ली की स्थानीय सरकार भाजपा से खिसककर आप के पाले में चली गई। भाजपा अपने अश्वमेघ के विजय रथ को नहीं थाम सकी तो फिर कैसे वह होने वाले पांच राज्यों में अपने अश्वमेघ के विजय रथ को दौड़ा पाएगी….?  हां भले ही होने वाले पांच विधानसभा चुनावों में बंगाल में बीजेपी कुछ सीटें बढ़ा सकती है लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए सत्ता तक पहुंचना बीजेपी के लिए बहुत मुश्किल या कहा जा सकता है कि शिहासन तक पहुंचने के लिए लोहे के चने चबाने होंगे।  भाजपा को अब समझना होगा कि उसकी कार्यशैली और  नेतृत्व ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है। धीरे-धीरे राज्यों में भाजपा का जनाधार घटने का मतलब है देश की जनता आने वाले चुनाव में किसी भी दल को भारी बहुमत नहीं देगी और न हीं उसे बंपर रूप से गद्दी में बैठाएगी, क्योंकि देश की जनता ने देख लिया कि किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत देने का मतलब है अपने को विना लगाम वाले घोड़े पर बैठा देना।या फिर महाभारत के कौरवों की सरकार को बैठाना। अब आने वाले विधानसभा के 5 चुनाव में यह साबित भी हो जाएगा। सरकारें बदलेगी तो जरूर, परंतु स्पष्ट बहुमत के साथ नहीं। भाजपा की केंद्र सरकार द्वारा जिस प्रकार लगातार महंगाई पर काबू न पाना, पेट्रोल डीजल के मूल्यों में नियंत्रण खो देना, महंगाई का चरम सीमा पर पहुंचना, किसान आंदोलन का 100 दिन गुजर जाने के बाद भी कि कोई हल न निकलना। यह केंद्रीय मंत्री मंडल के मंत्रियों की काबिलियत और केंद्रीय शासन के नीति-निर्माताओं की योग्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए बहुत है। बेलगाम अफसरशाही का ही नतीजा है कि उल जलूल नियम कायदों की भरमार हो रही है। प्रतिपक्ष और जनता को विश्वास में लिए विना नियम कानून बनाने का काम हो रहा है। किसान आंदोलन का कोई सार्थक नतीजा नहीं निकल पा रहा वही वर्तमान भाजपा सरकार का केवल जनता के हित की बात छोड़ कारपोरेट घरानों को ही समर्थन देना या उनके हित के लिए नियम बनाना, बाजार के लगातार बिगड़ती स्थिति, बेरोजगारी की लंबी लाइन, स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल स्थिति, राज्यों में बढ़ता क्षेत्रवाद, धार्मिक उन्माद व जातीय आक्रोश कहीं ना कहीं भाजपा सरकार को कटघरे में खड़े करने के लिए काफी है। उसी का नतीजा है कि भाजपा की सरकार होते हुए दिल्ली में भाजपा का नगर निगम चुनाव में साफ हो जाना ने अन्य दलों को मजबूत करने और जिताने का काम किया है। अब जनता भाषणों, घोषणाओं और जुमले बाजी पर विश्वास नहीं करती बल्कि जमीन पर हुए कार्यों पर आंकलन कर निर्णय लेने लगी है। जनता का निर्णय विना आवाज वाली लाठी है जिससे जब वह मार करती है तो बड़ी-बड़ी सत्ताएं और बड़े धुरंधर जमीन की धूल फांकते नजर आने लगते हैं।  इसलिए भाजपा को इस मुगालते में नहीं रहना है कि वह पांच राज्यों में सफल हो जाएगी भाजपा को पंजाब में भी जनता ने आईना दिखाया है दिल्ली ने भी आईना दिखा दिया और अन्य राज्यों में भी भाजपा को जनता की पीड़ा का सामना करना होगा।

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