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फूलों का त्योहार, फूलदेई, हर्षोल्लास से मनाया

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

 फूलों का त्योहार, फूलदेई, हर्षोल्लास से मनाया

पहाड़ों में तो चैत्र माह का पहला दिन फूलों के नाम ही कर दिया गया है. इस दिन से फूलदेई का त्योहार शुरू होता है. टोकरियों में फूल लेकर बच्चे घर-घर जाते हैं और देहरी पर फूल चढ़ाते हुए गाते हैं:

फूल देई छम्मा देई 
दैंणी द्वार, भर भकार
ये देई कें बार-बार नमस्कार!

वासंती हवा चली और फूलों का मौसम आ गया! लेकिन, क्या आप विश्वास करेंगे कि एक समय ऐसा भी था, जब धरती पर फूल नहीं थे! करोड़ों वर्ष पहले की बात है. धरती पर चारों ओर बड़े-बड़े दलदल फैले हुए थे. उनमें ऊंचे-ऊंचे मॉस और फर्न के पेड़ उगते थे. दलदलों में विशालकाय डायनोसॉर विचरते थे. फिर ऐसे पेड़ों का जन्म हुआ जिनमें काठ के फल और बीज बने. हमारे आज के चीड़, देवदार उन्हीं के तो वंशज हैं. फिर ऐसे पेड़-पौधों का जन्म हुआ जिनमें फूल खिल उठे. पहले तो केवल पत्तों की हरियाली थी. तब चारों ओर हरा ही हरा रंग दिखाई देता होगा. फिर फूल खिले और चारों ओर रंगों की बहार छा गई.

फूलों की सुन्दरता और खुशबू ने मानव का मन मोह लििया। फिर मानव ने सोचा क्यों ना इस प्रकृति के सौंदर्य को अपने सामाजिक जीवन में प्रवेश दिलाया जाए फिर शायद उसने कल्पना को साकार देने के लिए  त्योहार के रूप मेंं फूलों को सम्मान दिलाया उत्तराखंड के पहाड़़ पहले से ही प्रकृति से भरपूर है इसीलिए पहाड़ के निवासियों ने फूलों के त्योहार केेे रूप में सामाजिक रूप में अपनाकर अपने को तरोताजा और स्फूर्ति का काम किया। फूलदेई पर्व पर उत्तराखंड के अधिकांश क्षेत्रों में छोटे बच्चे विशेष रूप से बालिकाएं घरो की देहलीज में सुबह तड़के फुल डालते हैं। कहीं-कहीं तो यह फूल डालनेे की प्रक्रिया1 माह तक लगातार जारी रहती हैै। प्रत्येक घर से बच्चों को से बच्चे सामर्थ्यय अनुसार धन कपड़े व चावल गुड़ आदि दिया जाताा है। फिर सभी बच्चे अपने-अपने गांव के मंदिर में भंडारे का आयोजन करते हैंं। 

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