कोटद्वार नगर निगम की गौशाला में फंसा फिर पेंच,सिर मुंडाते ही ओले पड़े
गौशाला संचालक समिति निशुल्क गौशाला संचालन शोसल मिडिया में जता रही असमर्थता
नगरनिगम बनने के बाद दो बार गलत चयन के जरिए शर्मिंदगी उठा रहा नगरनिगम बोर्ड
कोटद्वार। कोटद्वार नगरनिगम बनने के बाद से निगम कई मुद्दों पर फजीहत झेलता आ रहा है। अधकचरे ज्ञान के बोर्ड,ठेके के कर्मचारियों, अधिकारियों और बिना पावर के मुखिया के चलते कोटद्वार की आम जनता को भारी मुसीबतों और दुश्वारियों से गुजरना पड़ रहा है। कुछ रोजमर्रा की आम परेशिनियों ने जिन्होंने कोटद्वार की जनता की नाक में दम किया हुआ है जिनका समाधान न तो नगरनिगम के पास है और न ही राज्य सरकार के पास। यही नही कोटद्वार के चुने हुए नाकाम और गैरजिम्मेदार जनप्रतिनिधि भी इन समस्याओं का कोई समाधान है।
विकराल समस्या का रुप धारण करती आवारा पशुओं की समस्या तो कोटद्वार में नगरनिगम बोर्ड और प्रशासन के लिए रेगिस्तान में पानी ढूंढने जैसी है। नगरनिगम कोटद्वार की स्थिति ठीक मृग मरीचिका के समान नजर आती है। क्योंकि जब जब नगरनिगम ने गौशाला शुरू करने को लेकर निर्णय लिया तब तब गौशाला ने राजनीतिक रूप ले लिया या फिर अनुभवहीन शासन प्रशासन और संस्था की तिकड़ी कोटद्वार नगरनिगम की गौशाला संचालन में असफल हुई। वहीं नगरनिगम द्वारा गौशाला निशुल्क चलाने के टेंडर प्रक्रिया में भी घालमेल दिख रहा है। मंहगाई के दौर में जब भूसा ही फसल के समय ₹1600 से 1800 प्रति कुंतल, दाना चोकर ₹ 2000 प्रति कुंटल हो निशुल्क गौशाला संचालन असंभव लगता है। लगता है कोटद्वार नगरनिगम की मंशा गौशाला संचालन की नहीं है वह इस गौशाला को अनाप टेंडर नियमों के तहत विवादों में ही रखना चाहते हैं।नगर निगम की गौशाला संचालन को लेकर यह मुहावरा शायद सटीक बैठता है ,” न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी ” ऐसा इसलिए लिखना पड़ रहा है कोटद्वार नगर निगम ने जब पहली बार गौशाला आबंटित की तो मेयर व उनके पति की भूमिका ने अपने पसंदीदा सामाजिक संस्था को को लाभ देने के कारण लगातार राजनीतिक रंग और सामाजिक संस्था का विवादों में घिर जाने के कारण गौशाला को बीच में छोड़ देने के कारण गौशाला में आवारा पशुधन को नगरनिगम नहीं संभाल पाया। वहीं नगरनिगम प्रशासन ने पुनः नए सिरे से एक अनुभवहीन संस्था को टेंडर जारी किया है संस्था की मुखिया का शोसल मीडिया में चल रहा विडियो कि बिना संसाधनों के गौशाला संचालन असंभव है कोटद्वार में चर्चाओं में हैं। यानि कि “फसल पकन से ओले पड़ने लगे या फिर सिर मुंडाते ही ओले पड़ गए”।
जब इस संबंध में लोक संवाद टुडे ने कोटद्वार निगम आयुक्त से बात की तो उनका क्या कहना है विडियो विस्तार से पूरा देखिए-