उत्तराखंड की महान प्रेरणास्रोत सात मातृशक्तियां
उत्तराखंड भले ही यौवनारंभ का राज्य हो परन्तु उत्तराखंड की महान परम्परा को जीवन्त करने वाली प्रेरणास्रोत मातृशक्ति ने समाज और देश के लिए जो काम विना संसाधनों और जीवटता के साथ विषम परिस्थितियों के वावजूद कर डाले उससे उत्तराखंड ही नहीं वरन पूरा देश गौरवान्वित महसूस करता है. आज लोक संवाद टुडे अपने पाठकों को उत्तराखंड की सात ऐसी मातृशक्ति से परिचित कराने का प्रयास कर रहा है. जिनके कार्य हर उत्राखंडी और भारतीयों के लिए प्रेरणास्रोत है.
पुष्कर सिंह पवार “पदम”
1. उत्तराखंडी वीरांगना तीलू रौतेली

15 साल की उम्र में अपने राज्य के वीरगति पाने वाली तीलू रौतेली मध्यकाल में गढ़वाल की शासिका थी. तीलू रौतेली के सम्मान में उत्तराखंड सरकार हर वर्ष उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित करती है. उत्तराखंड में कांडा और बीरोंखाल में हर साल तीलू रौतेली की याद में मेले का आयोजन किया जाता है.
2. दारमा की जसुली अम्मा

पहाड़ में आज भी सड़कों के किनारे कई सारे टूटे-फूटे सराय देखने को मिलते हैं. सदियों पुराने यह सभी सराय दारमा की एक महिला जसुली द्वारा बनवाये गये हैं. जसुली बूढी के नाम से विख्यात इस महिला ने अपने जीवन की पूरी कमाई इन्हीं सराय के निर्माण में लगा दी थी.
3. एक असाधारण व्यक्तित्व की मालकिन टिंचरी माई

उत्तराखंड जब कभी नशा विरोधी आन्दोलन के विषय में बातचीत होगी टिंचरी माई का नाम हेमशा लिया जायेगा. टिंचरी माई ने सत्तर के दशक में पहाड़ में शराब विरोधी आन्दोलन चलाया गया था. एक सामान्य महिला दीपा देवी से टिंचरी माई तक का उनके जीवन का सफ़र अनुकरणीय है.
. रैंणी की गौरा

चिपको आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली महिला गौरा देवी गढ़वाल के रैंणी गाँव की रहने वाली थी. गौरा देवी जंगलों को अपना मायका मानती थी. जब ठेकेदार जंगल के पेड़ काटने रैंणी गांव पहुंचे तो गौरा देवी ने कहा : “पहले मुझे गोली मारो फिर काट लो हमारा मायका.”
5. धारचूला की चंद्रप्रभा ऐतवाल

चंद्रप्रभा ऐतवाल उत्तराखंड की एक प्रमुख पर्वतारोही हैं. धारचूला में जन्मीं चंद्रप्रभा ऐतवाल ने हिमालय की बहुत सी चोटियां फ़तेह की हैं. भारत सरकार ने चंद्रप्रभा ऐतवाल को 1981 में अर्जुन अवार्ड और 1990 में पद्मश्री दिया था.
6. लोक गायिका, कबोतरी देवी
सत्तर के दशक में आकाशवाणी से एक गीत आता था ज्यों ज्यों आज पनी , भोल पनी ज्यों-ज्यों पोरखिन न्हें जोंला… पहाड़ के खेतों में काम करने वाली महिलाओं के बीच में यह आवाज खूब लोकप्रिय थी. यह आवाज थी लोकगायिका कबूतरी देवी की.
7. पहली भारतीय एवरेस्ट विजेता महिला बछेंद्री पाल

उत्तरकाशी में जन्मी बछेंद्री पाल एवरेस्ट फतेह करने वाली पहली भारतीय महिला हैं. 23 मई 1984 को यह कारनामा करने वाली भारत की पहली बनी. उन्हें सरकार ने अनेक पुरूस्कार से सम्मानित किया है.