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उत्तराखंड ग्रामीण लोकतंत्र का पर्व

रिपोर्टर: Author August 5, 2026

 उत्तराखंड ग्रामीण लोकतंत्र का पर्व 

 उत्तराखंड त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव व पहाड़ी मतदाता 
 चुनाव गांवों में, जनप्रतिनिधि शहरों से ….
 वर्तमान उत्तराखंड के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों से ग्रामीण जनता की दूरी……!

पुष्कर सिंह पवार “पदम”

 उत्तराखंड ग्रामीण। नमस्कार मित्रों स्वास्थ्य समस्याओं के चलते अपने पाठकों से दूरी के लिए क्षमा चाहूंगा। लम्बे समय के बाद आज में आपके लिए उत्तराखंड में होने जा रहे त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों और पहाड़ी जनमानस की जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा को लेकर संक्षिप्त समीक्षा रख रहा हूं। अच्छा लगे तो उत्साहवर्धन हेतु ब्लॉग को लाईक, सब्सक्राइब एवं शेयर अवश्य करें।
 उत्तराखंड सरकार द्वारा ना-नुकुर करते-करते आखिरकार त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की घोषणा कर ही डाली भले वह उच्च न्यायालय से मिली फटकार के बाद….! पहले तो पंचायत चुनावों को टालने लेकर राज्य सरकार ने आरक्षण के नाम पर जो नौटंकी खेली वह जगजाहिर है ही। वहीं अब सरकार को नामांकन के बाद पता चल ही रहा है लोग जिस तरह से चुनावों से दूरी बना रहे हैं व भविष्य के लोकतंत्र के लिए तो शुभ संकेत नहीं है वहीं राज्य सरकार की पहाड़ी और पहाड़ की जनता के प्रती बेरूखी का भी खामियाजा ही है जिस कारण मतदाता ही नहीं जनप्रतिनिधि की दावेदारी कर रहे पहाड़ी जनमानस भी सरकार की पहाड़ी और पहाड़ विरोधी नीतियों से नाराज़गी बताती है
। 
 क्या है वर्तमान त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों की स्थिति 
 वर्तमान में उत्तराखंड में जनप्रतिनिधियों के कुल पद – 66,418 
 पोलिंग बूथों की संख्या – 10,529 ( 12 जिलों में) 
 सबसे अधिक बूथ वाला जिला – 1426, उधम सिंह नगर 
 सबसे कम बूथ वाला जिला – 293, चंपावत 
 1000 बूथों से अधिक जिले – 1- उधम सिंह नगर 1426 बूथ 
  2- टिहरी – 1301 बूथ। 3- अल्मोड़ा – 1281 बूथ 
  4- पौड़ी – 1191 बूथ।  4- 1090 
 कुल ग्रामीण मतदाता – 47,72,020 
 महिला मतदाता – 23,08,465
 पुरुष मतदाता – 24,63183
  वर्तमान त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में राज्य सरकार को जो चौंकाने वाला जनता का चुनावों को लेकर जो निर्णय देखने को मिला वह निःसंदेह सरकार व सरकारी मशीनरी की नींद उड़ानें के लिए काफी है। सबसे अधिक चौंकाने वाली उत्तराखंड की जनता की त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर प्रतिक्रिया वह नामांकन को लेकर है जिस तरह जनता और ग्रामीण जनप्रतिनिधियों ने नामांकन के प्रति बेरुखी दिखाई वह निःसंदेह सरकार और सरकारी मशीनरी को आईना दिखाने के लिए काफी है।
 गौरतलब है कि उत्तराखंड में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के लिए कुल 66,418 पद स्वीकृत हैं परन्तु उसके सापेक्ष वर्तमान पंचायत चुनावों के लिए कुल 63,812 नामांकन होना कहीं न कहीं राज्य सरकार द्वारा खोखली घोषणाओं, जनता और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा की ओर इशारा करता है। 
 कुछेक उदाहरण जो सोसल मीडिया और समाचारों की सुर्खियां बन रहे हैं, उनमें उत्तरकाशी जिले के भारत चीन सीमा से सटे 10 महत्वपूर्ण बाईब्रेट ग्राम पंचायतों में से एक मुखबा पंचायत से जुड़े पंचायत के दावेदारों ने तक नामांकन न करके चौंकाने वाला निर्णय लिया है। ग्रामीणों और ग्रामीण जनप्रतिनिधियों की नाराज़गी का कारण 1983 में स्वीकृत हर्सिल- जांगला- मुखबा 6 किमी सड़क न बनने और घोषणाओं और आश्वासनों से ठगे जाने के बाद लिया गया।
  उत्तराखंड की समस्त ग्रामीण मतदाताओं से अपेक्षा की जाती है कि जहां-जहां मतदाता मतदान कर अपनी ग्रामीण सरकार बनाने जा रहे हैं तो आपको सोच समझकर अपना जनप्रतिनिधि भाई-भतीजावाद, जात-पात, धन-बल से हटकर, व गांव से बाहर रहने को दूर रखकर चुनना होगा। जिस जनप्रतिनिधि को आप चुनने जा रहे हो आपके गांव में स्थाई रूप में रहता हो, उसके बच्चे स्थानीय गांवों के विद्यालयों में पढ़ने वाले हों, कारोबार ग्रामीण क्षेत्रों में ही हो तो वह जनप्रतिनिधि आपके दिन रात सुख दुख का साथी होगा अन्यथा शहर का होगा तो आप उसे भूसे के ढेर में सुई ढूंढने के समान खोजते रहोगे। 
 बाकी जिस तरह की समझदारी नामांकन और कुछेक क्षेत्रों में निर्विरोध प्रतिनिधि चुनकर दिखाई है उम्मीद करते मतदान कर जनप्रतिनिधि चुनने वाले मतदाता भी इस बार अपनी काबिलियत दिखाएंगे।

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